मायने रखती है तुम्हारी खुद की खुशी तुम्हारी अप्रतिबंधित मुस्कान उफ , खिलखिलाकर हँसना जरुरत है जिंदगी की बंदगी उतनी ही जितनी मौत जीवन को स्वीकार्य है पाथर तो नहीं , पाथर पर भी
चिलबिल सी आतुर निडर आजाद उन्मुक्त उड़ान देर तक हवा में डोलती रही किसी दिन देखा मैंने उसे मिट्टी के अंक में अंकुए पात खिले हुए मुस्कुराती हुई नवनीत सम पल्लव को हिलाती हुई ।
कोरे कागज की निःशब्द भाषा टकटकी बाँधे कुछ लिखने को कहती है सुख - दुख , आशा - निराशा राग - विराग , तृष्णा और तोष वीर ओज सहृदय माधुर्य प्रेमभाव पल्लवित ऋतुनय