अस्थिर होती मति , अपना परिचय कहाँ पायेगी ? क्षण - क्षण बदलते दृश्यों में जगत का सार देख पायेगी ? या सत्य की तलाश में , बेखबर बटोही बनकर रहना होगा ? इतना प्रबल आवेग है , हताशा जब घटा घेर रही है
सबकुछ आँखों के सामने प्रत्यक्ष उजला है नजर उठाकर देखना तो होगा जिसके लिए अपने घर से इतनी दूर अजनबी शहर में चले आये है कैसा बैर है ? लड़ाई भी नहीं है भीतर का प्रकाश ही तो अपनी मंजिल है
सौजन्य : दूरदर्शन झारखंड मन मंदिर प्रभु का सुंदर धाम भक्ति की पावन ज्योत अभिराम तम की कारा से करती जो मुक्त तुम संघर्ष की अमिट गाथा वीरता प्रेम की अमित भाषा दया स्नेह से पुलक वत्सल सुप्त न अब खोए , यूँ सोये रहो प्रात उदित नवजीवन की बेला यूँ खिलती रेशों रेशों , धानों धानों छिटक तिनके अंक भर अपने प्रात लेती , हिये की संवेदी निकृष्ट विचार न मैल रहे , आत्मशोधन की दीप वर्तिका मन मंदिर चलो मिलकर प्रज्ज्वलित करे ।
ओ ! इतिहास की घड़ियाँ चुप खड़ा निस्तब्ध क्या तूने पहने ली बेड़ियाँ अचंभा में पड़ा शून्य को तकता निर्जन में अकेला जर्जर वृध्द ? परिवर्तन की आंधियाँ बदल देती है कितना कुछ
वह बिंब जिसमें मैं बँधी , बँधकर भी स्वतंत्र सदा आत्मरुप निर्बंध रही , वही सच्चा बंधन था जिसे मैंने कभी तोड़ा नहीं जिसका मोह मैंने कभी छोड़ा नहीं आँधियों की झंझा में भी उर में जलता रहा विश्वास का दीप अखंड
अवनी का दिवसालोक शोभा सुंदर विस्तृत अंतर - आलोक श्रुति पाठ प्रार्थना के रव भर लायी पक्षियों के मिस बोल में तुमुल स्वर मिलाए प्रभाती की पावनबेला मंगलगीत घर - घर गाए नदियों का जल निरंतर पथ की पगडंडियाँ जैसे चलती सतत जाए आते - जाते पथिक में तू ना अनजान
वाणी तू गई टूट शब्द गए हमसे रुठ अर्थ - भाव बिसर गए ज्यों किहीं दूर खोते से अपने नेत्र सजल चुप है उनमें एक मूक गहरी वेदना छिपी सुबक रही अंतर्मन की विवर्ण दशा मन हारे ना शब्द - शक्ति यही वर दे
तेज हवाएँ लू लपट सूखे मैदानों में हाहाकार प्रचण्डिका अग्निधार बाण उफनती चिंगारियाँ लौहवर्ण सावधान मनसा सावधान ! थोड़ा सोच-विचारकर काम करो जहाँ भी जैसे भी संभव हो सके अपनी धरतीमाता की पुकार सुनो बनके जो चारों दिशाओं में गूँज रही मजदूरों कामगरों बेबस बेजुबानों की आह
अन्तश्चेतना का दीप जला है मनमानव ईश्वरत्व के आह्वान में विश्वास का दृढ़ आधार छिपा है लगा रही है खुली घाटी में एक मौन विनम्र पुकार , साहस धैर्य बिंदु प्रकृति माता ने सिखलाया ; वह खड़ा है दिशाविहीन नहीं जो पथविहीन नहीं हाँ , मगर अभी उसका जागना बाकी है
एक स्त्री माँ है , एक पुरुष पिता है , एक स्त्री बहू है , एक पुरुष दामाद है , एक स्त्री बुआ है , एक पुरुष फूफा है , एक स्त्री भाभी है , एक पुरुष भैया है , एक स्त्री मामी है , एक पुरुष मामा है ,
यहीं समय है , सही समय है जो गुजर गया , वो बीता कल था जो अभी प्रकट नहीं है , उसकी चिंता , उसका संवरण करना व्यर्थ है , दुश्चिंताओं की ज्वालाओं में जल ईर्ष्या की अग्नि जलाना और भी दाहक है , सफलताओं की चाह में , असफलता की सीख को भूलाना
प्रात किरणों ने किया सवेरा उषा भर लायी सुबहा की लाली भोर भई पनघट पर गंगा जमुना सरयू गोदावरी कृष्णा कावेरी शिप्रा नर्मदा सरस्वती ब्रह्मपुत्र सिंधु अगणित मनघाटों पर करते नमस्कार
कण कण में बसते है । हर क्षण में रहते है । मेरे राम मेरे साथ प्रतिपल चलते है । बनके नैया के खैवणहार मेरी नैया पार लगाते है । अंधेरे में करते उजियारा राह दिखाते है । मुश्किलों में साथ निभाते है ।
कानों में एक अनकहा संगीत घुल रहा है हाईवे का ये लम्बा हो गया सफर अब जल्दी कटेगा बैठे बैठे पूरे बदन में जो दर्द जाग उठा है उसके लिए ये हसीं वादियाँ हमदर्द बनेंगी आखिर रोज प्रदूषण का महाभयंकर दर्द बिना कोई उफ किये चुपचाप सहती है पर कब तक ? हम कब चेतेंगे ? और इस ममतामयी माँ का क्षोभ हरेंगे जो हम सबको देती है इतना प्...
अन्तस को हिलोरे दे जग ये सब कुछ नव नित नूतन परम विनीत कृपालु जगकरता कारण हो कार्य हो जगजीवन का चक्र तुम्हीं से , सृष्टिकाल के बंधन , लगे क्या वास्तव है ? यथार्थ है ? या फिर इसके ऊपर कोई और ही चमत्कार शीत लहरी सी मन कँपकँपाये कहाँ उद्गम , कहाँ से बह निकली थी
खिड़की खोले बिना दीदार कैसे होगा , जानकर जो अनजान बने परिचय कैसे पूर्ण होगा ? जगाये हम उसको जो गहरी नींद में अपलक शांत चुप सो रहा , पर जगाये कैसे उसको जो मात्र अभिनय कर स्व - पर को छल रहा ? कैसे देखेंगे इस पल्लव प्रात को
चलता रहता अंतहीन राहों में क्या पाने की तलाश इसे जिसको पाना , जिसको ढूँढा जाना है , वह तो अन्तर्उर में साक्षात विराजा है । किन ख्यालों में खोये हुए किन आश्चर्यों में जा पड़े उफनता सा ज्वार , मन को
ओ रे राधा के श्याम ओ रे यशोदा के लाल मोहे रंग दो आज ऐसो चटक लाल गुलाल दुनिया के रंग सारे पीछे फीके पड़ जाए दुनिया के रंग सारे पीछे फीके पड़ जाए मेरे पैरों में भर दो ऐसी ताल