मेवाड़ - केसरी देख रहा , केवल रण का न तमाशा था । वह दौड़ - दौड़ करता था रण , वह मान - रक्त का प्यासा था। चढ़कर चेतक पर घूम - घूम , करता सेना रखवाली था ।
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!