ओ ! इतिहास की घड़ियाँ चुप खड़ा निस्तब्ध क्या तूने पहने ली बेड़ियाँ अचंभा में पड़ा शून्य को तकता निर्जन में अकेला जर्जर वृध्द ? परिवर्तन की आंधियाँ बदल देती है कितना कुछ
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!