मेरा बदलता गाँव अब शहर होता जा रहा है तभी तो माटी के कच्चे चबूतरे याद हो गए है उन पर गोबर की लिपाई का सौंदर्य संस्कार याद रह गए नीम भी तो कट गई कितना कुछ देखा होगा उस नीम की विशाल हरीतिमा ने उसकी टहनियों की दातून बनती थी अब तो कोलगेट के ऐड है फ्लेवर फाॅग वाले कौन चाहेगा कैसली नीम को वो याद करेगा , करता रहता है
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!