अस्थिर होती मति , अपना परिचय कहाँ पायेगी ? क्षण - क्षण बदलते दृश्यों में जगत का सार देख पायेगी ? या सत्य की तलाश में , बेखबर बटोही बनकर रहना होगा ? इतना प्रबल आवेग है , हताशा जब घटा घेर रही है
चंचलता चित्त की चमक सुहाती ज्योतिपुँज की गहराई में डूबी केसरी कुँज श्वेतमय पारिजात प्रिय सर्मिपत हो जाना पूर्ण रुप में खुले दिल से अपनी सुरभि को लहलहाना , क्षुब्ध मन को मिले जो विश्राम पथिक की आशा - निराशा अंतर्द्वंद को आराम
सबकुछ आँखों के सामने प्रत्यक्ष उजला है नजर उठाकर देखना तो होगा जिसके लिए अपने घर से इतनी दूर अजनबी शहर में चले आये है कैसा बैर है ? लड़ाई भी नहीं है भीतर का प्रकाश ही तो अपनी मंजिल है
सौजन्य : दूरदर्शन झारखंड मन मंदिर प्रभु का सुंदर धाम भक्ति की पावन ज्योत अभिराम तम की कारा से करती जो मुक्त तुम संघर्ष की अमिट गाथा वीरता प्रेम की अमित भाषा दया स्नेह से पुलक वत्सल सुप्त न अब खोए , यूँ सोये रहो प्रात उदित नवजीवन की बेला यूँ खिलती रेशों रेशों , धानों धानों छिटक तिनके अंक भर अपने प्रात लेती , हिये की संवेदी निकृष्ट विचार न मैल रहे , आत्मशोधन की दीप वर्तिका मन मंदिर चलो मिलकर प्रज्ज्वलित करे ।
ओ ! इतिहास की घड़ियाँ चुप खड़ा निस्तब्ध क्या तूने पहने ली बेड़ियाँ अचंभा में पड़ा शून्य को तकता निर्जन में अकेला जर्जर वृध्द ? परिवर्तन की आंधियाँ बदल देती है कितना कुछ
संकेत संकेतक कभी शुभ समाचार की कभी किसी अनहोनी अनिष्ट की दोनों ही रहस्य भविष्य के गर्भ में छिपे है जिसको उस त्रिकालदर्शी के सिवा मैंने क्या किसी ने भी नहीं देखा , तो सुख- दुख के तराजू बराबर है दिन के बाद रात, रात के बाद दिन कोई बाधा नहीं , फिर अस्वीकार कैसा
जरुरी नहीं की हर गीत लिखा जाए कुछ गीत बस यूँही गुनगुना लिया जाए खुली हवा में खुले जीवन के साथ हर बाधा से मुक्त अविमुक्त स्वतंत्र खग की उड़ान अनन्त व्योम में विचरते बादलों की भाँति बिना व्यक्त किए व्यक्त कर देने की बात हवाओं की शीतल छाँह में घुलते शब्द
काश से निकल बाहर खुली हवा में खुद को हहराना दो थोड़ा - थोड़ा बंद रहकर सीलन की बदबू छाई की बारिश से जमीन पर जम आई काई है दोष नहीं किसी का , काश का भरोसा काँच सा
वह बिंब जिसमें मैं बँधी , बँधकर भी स्वतंत्र सदा आत्मरुप निर्बंध रही , वही सच्चा बंधन था जिसे मैंने कभी तोड़ा नहीं जिसका मोह मैंने कभी छोड़ा नहीं आँधियों की झंझा में भी उर में जलता रहा विश्वास का दीप अखंड
यहीं समय है , सही समय है जो गुजर गया , वो बीता कल था जो अभी प्रकट नहीं है , उसकी चिंता , उसका संवरण करना व्यर्थ है , दुश्चिंताओं की ज्वालाओं में जल ईर्ष्या की अग्नि जलाना और भी दाहक है , सफलताओं की चाह में , असफलता की सीख को भूलाना
अन्तस को हिलोरे दे जग ये सब कुछ नव नित नूतन परम विनीत कृपालु जगकरता कारण हो कार्य हो जगजीवन का चक्र तुम्हीं से , सृष्टिकाल के बंधन , लगे क्या वास्तव है ? यथार्थ है ? या फिर इसके ऊपर कोई और ही चमत्कार शीत लहरी सी मन कँपकँपाये कहाँ उद्गम , कहाँ से बह निकली थी
मैं दीप बन जलूँगी पथ प्रकाश बन हर तम में लौ भरुँगी । झंझा हो तूफां आँधी बिजली पानी हो या बरसात , भाव न मिटे मन का श्वास माला का फेर बदल जाए रुप बदले पर स्वरुप वहीं रह जाए ।
मौन रहा , और कुछ न कहा .. शब्दों को निः शब्द किया उत्तर को ही प्रश्न किया ? एकांतर सीधी सरल रेखा को अन्वांतर का रुप दिया । त्रासदी की विकट वेदना , विश्व करुणा ने अश्रुपात किया ।