श्याम संध्या दीप जलाए अस्ताचल सूर्य सागर अंक अब विश्राम पाये दिन का ताप उतरा शीतल हवा का झोंका धीरे से बह निकला अस्फुट ध्वनि कुछ सहज हुई निस्तब्ध शांत में एक गहन वार्ता थी
जीवन खेल का मैदान है हार - जीत तो बस एक मुकाम है चलते रहना , आगे बढ़ते रहना हौंसले और इरादे की पहचान है हर पल आँखों में सपना पलता मुसाफिर वहीं है , जो न रुकता सर पर धूप हो बारिश का जोर हो हो पथरीली राह डगर कितनी ही दूर हो
हर मुसीबत अपने साथ एक प्रकाश का छिपा कोर लाती है हताशा को हराकर देखना , रोशनी वही नजर आती है मुकाम के पीछे भागती रहती है दुनिया , वहीं बस्ती अंधेरी खामोशी में जीवन की कहानी के ऐसे - ऐसे किरदार निभाती है
अस्थिर होती मति , अपना परिचय कहाँ पायेगी ? क्षण - क्षण बदलते दृश्यों में जगत का सार देख पायेगी ? या सत्य की तलाश में , बेखबर बटोही बनकर रहना होगा ? इतना प्रबल आवेग है , हताशा जब घटा घेर रही है
दिन , तारीखें , महीनें , साल निकल जाने वाले है तुम चलते रहो , एक समय मंजिल तक पहुँच जाओगे गोया मुस्कराओगे नहीं , मुस्कराओं चलते जाओ मुसाफिरी अभिमानी नहीं , ईर्ष्या नहीं द्वेष नहीं न कोई बचकानी शर्त , जीवन का उद्देश्य है
मेरा बदलता गाँव अब शहर होता जा रहा है तभी तो माटी के कच्चे चबूतरे याद हो गए है उन पर गोबर की लिपाई का सौंदर्य संस्कार याद रह गए नीम भी तो कट गई कितना कुछ देखा होगा उस नीम की विशाल हरीतिमा ने उसकी टहनियों की दातून बनती थी अब तो कोलगेट के ऐड है फ्लेवर फाॅग वाले कौन चाहेगा कैसली नीम को वो याद करेगा , करता रहता है
शब्द मौन अपनी बारीकियाँ बुन रहे है अपनी कमियों को झाँक रहे है अपनी सुंदरता पर कहीं वे इतरा रहे है कुछ इठला रहे है निरंतर बन और बिगड़ रहे है नदिया की आवेशित धारा यमुना बनी अष्टमी की व्याकुल और मचलती प्रतीत हो रही है बही जा रही है बंधनों के पार उसका आवेग उत्ताल आज व्यक्त होने को है ।
चंचलता चित्त की चमक सुहाती ज्योतिपुँज की गहराई में डूबी केसरी कुँज श्वेतमय पारिजात प्रिय सर्मिपत हो जाना पूर्ण रुप में खुले दिल से अपनी सुरभि को लहलहाना , क्षुब्ध मन को मिले जो विश्राम पथिक की आशा - निराशा अंतर्द्वंद को आराम
बाल कविता सी सुंदर धरा नीलांबर और धानी छटा बादल उड़ते आकाश में दूर - दूर चिड़ियाँ भी संग उड़ती उनके छोटे - छोटे पंखों की ऊँची उड़ान हौंले - हौंले , सरसर - फुर्र -फुर्र चिड़ियाँ रानी सुनो प्यारी तुम आना मेरे घर भी गुनगुन करके गाना गाना
उठो देखो आसमान की नीलिमा वे घुँघराले फाहे बादल जिस तरह से आसमाँ में अपनी गति से चले जा रहे है तुमको भी चलना है , विश्राम का मतलब ठहरना नहीं है अपनी ऊर्जा को संयत करना है
बड़े दिनों के बाद जेहन में बनके आज ये ख्याल आया है कि तेरी मुस्कारहटों पे ये दिल कई बार निसार हो आया है तेरी बातों का हमेें ये एहसास हो आया है कि तेरी मुस्कराहटों पे ये दिल कई बार निसार हो आया है राह की छाँवों बनके जो तुम यों ही साथ में साथ बन चल दी थी
जहाँ अभी कजरी के बोल तीखे - मीठे गाये जाते है सावन के झूले , हरियल की मनुहार लागी है इठलाता - बलखाता वह सरल सलोना श्रृंगार भींगता मननयन आज भी है उस करुण रस में ज्यों दूब भींगती प्रतीक्षा की लंबी अवधि वार गोरी का सजान है अभी उस पार ...
बारिश की बूँदें भीगती - भीगाती घर में एक अबोध चंचला बच्ची की तरह घुसी चली आई है उसके लिए सबकुछ जाना - पहचाना था दीवारें , लाॅन की घास गमले में लगे पौधे बरामदे की गली से सटा मिट्टी का गोल चबूतरा और क्यारियाँ उनमें हँसते और झूमते - गाते नन्हे - नन्हे से रंग - बिरंगें फूल और हरियाली । वहीं किनारे दीवार से सटा पाइप लगा है जिससे छत्त का सारा पानी जिस वेग और आवाज के साथ नीचे उतर रहा है लगता है कि पानी के निकास के लिए बनाई गई नाली के जगह पर ईट लगा दी जाये तो बच्चों के लिए खासा स्विमिंग पूल तैयार हो जायेगा। जैसाकि छोटे में अक्सर हम सब बच्चे बारिश मे किया करते थे दो - दो घंटें तक पानी में खेलते रहते थे नीचे नदिया ऊपर बारिश की मेहरबानी पर शायद ही हमें दो घंटें से ज्यादा पानी में रहने दिया जाता था क्योंकि इसके बाद सबकी मम्मी बारी - बारी से सबको आवाज लगाती की अब उतर आओ नीचे , बहुत भीग चुके जल्दी से नीचे आकर दो लोटा साफ पानी डालकर कपड़े बदल लो पर बच्चे तो बच्चे और बारिश तो बारिश जब तक कोई ऊपर आकर हमारे बनाए गए तालाब को देखना लेता और बदले में...
और मुझे अच्छा लगा , तुम्हारा यह पूछना मैं कैसी हूँ और दर्पण ने मुस्कुराकर जान लिया ये सौंदर्य सादगी में बुना जिम्मेदारियों की टोकरी बोझ , नहीं उसकी बैंबू से बनाई गई प्रेम की बुनाई थी अलस्सुबह से शाम तक का पूरा सफर कहानी हकीकत की थी सपने के रंग जिन पर चढ़े थे उसी कोमलता की लिलाई लिए जैसे नर्म स्फोट खुलते पल्लव पात जैसे माँ बाजार से लाए गए गेंहूँ को धोती थी और निथरने के लिए उस टोकरी में रख देती थी वैसे ही उसको देखना प्रेम के आँचल की झलकारी सी लिलाई , उसके प्रत्येक कार्य में मिल जायेगी और आज उसकी यह आभा अपने लिए और भी सुंदर लग रही है जो दुनिया मैं...
हर हार को जीत का रुप दे देती हो जितनी सहजता से तुम सबका ध्यान रख लेती हो उतनी सहजता की मांग है , अपने खोए सपनों को पूरा करो रास्ते पर चलते समय लोग क्या सोचेंगे , क्या सोच रहे है ये कभी भी तुम्हारे प्रश्न नहीं रहे है , इनसे प्रभावित होना
जहाँ से समय होकर निकलता है वहाँ देहरी के द्वार दो टेक अँखिया द्वंद्व निर्वतमान अपने सपने बुनती आसमान के प्रांगण में नीलिमा की जादुई , चहक भरे बक्से का पिटारा आज अभी अब से शेष प्रश्नों के
सौजन्य : दूरदर्शन झारखंड मन मंदिर प्रभु का सुंदर धाम भक्ति की पावन ज्योत अभिराम तम की कारा से करती जो मुक्त तुम संघर्ष की अमिट गाथा वीरता प्रेम की अमित भाषा दया स्नेह से पुलक वत्सल सुप्त न अब खोए , यूँ सोये रहो प्रात उदित नवजीवन की बेला यूँ खिलती रेशों रेशों , धानों धानों छिटक तिनके अंक भर अपने प्रात लेती , हिये की संवेदी निकृष्ट विचार न मैल रहे , आत्मशोधन की दीप वर्तिका मन मंदिर चलो मिलकर प्रज्ज्वलित करे ।
हँसी की तलाश लौट आओ भीतर है खोज लाओ मुढ़ भाव को छोड़कर तनिक मार्ग पर तो आओ कुछ बात है दिल की बेझिझक कह जाओ , सुनेंगे चुपचाप घंटें - दो घंटे चाहे जितनी लंबी हो बात दो शब्द या केवल मौन कुछ भी प्रश्न नहीं खड़े करेंगे , स्वत्व बोध की नव परिभाषा गढेंगे
स्पष्ट है चुप है ताना - बाना उछलती गेंद घूरती आँख टेसू के लाल फूल धूप में जलता ग्लोब निर्मोह बनी अँखिया अपनी - अपनी कहानियों में डूबी हुई उलझे हुए धागे उनकी उलझी हुई गाँठें दोनों छोर व्यथित टूटे जिंदगी की सीढ़ी ऊपर - नीचे , नीचे - ऊपर