काश से निकल बाहर खुली हवा में खुद को हहराना दो थोड़ा - थोड़ा बंद रहकर सीलन की बदबू छाई की बारिश से जमीन पर जम आई काई है दोष नहीं किसी का , काश का भरोसा काँच सा
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!