तू ही बता अब मैं कहा जाऊँ
थामा के जीवन की डोर तूझे
अब मैं चिर विश्राम को पाऊँ
माता के आँचल की ओर
पिता के दुलारे की ओर
खिलखिलाते बचपन की ओर
चिर स्वस्थ तन - मन की कोर
दयालु स्नेह सहभावी सुकुमार
प्रेम की मजबूती की गठजोड़
कि अब निश्चिंता को पाती हूँ
वेणु की धुनि में सुनता राग मधुर
बदलते क्रम में अवसान के इस क्षण में
जो मुस्काता है , वो गीत मैं गाना चाहती हूँ
तन्मय जीवन के स्पंदन में तेरी उद्भावना चाहती हूँ ।

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