अस्थिर होती मति , अपना परिचय कहाँ पायेगी ?
क्षण - क्षण बदलते दृश्यों में जगत का सार देख पायेगी ?
या सत्य की तलाश में , बेखबर बटोही बनकर रहना होगा ?
इतना प्रबल आवेग है , हताशा जब घटा घेर रही है
फिर भी हृदय विश्वास में पल रहा है , हे पथिक !
साँझ का यह सन्धि प्रकाश , मुझे दीप बारने को कह रहा है
हृदय में विश्वास पल रहा है , यह मन साँवरे से जुड़ रहा है ।
पल - पल अपना पता पा रही है , ये बावरिया बनी तेरी सांवरिया
गीत तेरे गा रही है ।

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 21 सितंबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंएक विश्वास का दीया जल ही उठता है, जिंदा रहने के लिए, जीने के लिए,,जरूरी भी है,, वरना जिंदगी जिंदगी कहां रहती है,,बहुत खूब
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
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