सर्द दिनों की रुहानी आहट लिए मौसम का रुख बदला है सिमटा - सिमटा दिन गुलाबी ठंडक लिए सूरज आसमाँ के पट पर खिलने लगे गुलाब मंजरी पर पुलकित पुष्प
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!
जबकि बचपन बीत गया होता है ।।
कितना कुछ बदल जाता है ।
और जो बदल ना सके वो जिंदगी
जिंदगी नहीं ।।
हम कठपुतली का खेल देखकर
खिलखिलाते है मुस्कुराते है जमके
ताली भी बजाते है
पर जब हम उस रब की कठपुतली
इस खेल का हिस्सा बन जिंदगी के
मंच पर उतरते है तो खिसियाते है ।
बेहतरीन रचना
जवाब देंहटाएंआभार पढ़वाने के लिए
सादर