सर्द दिनों की रुहानी आहट लिए मौसम का रुख बदला है सिमटा - सिमटा दिन गुलाबी ठंडक लिए सूरज आसमाँ के पट पर खिलने लगे गुलाब मंजरी पर पुलकित पुष्प
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!
मेरी माँ रेनू के स्नेहिल आँचल की छाँव तले ..!
शब्द मौन अपनी बारीकियाँ बुन रहे है
अपनी कमियों को झाँक रहे है
अपनी सुंदरता पर कहीं वे
इतरा रहे है कुछ इठला रहे है
निरंतर बन और बिगड़ रहे है
नदिया की आवेशित धारा
यमुना बनी अष्टमी की
व्याकुल और मचलती प्रतीत हो रही है
बही जा रही है बंधनों के पार
उसका आवेग उत्ताल आज व्यक्त होने को है ।
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