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श्याम संध्या

मेरा गाँव

मेरा  बदलता  गाँव 

अब  शहर  होता  जा  रहा  है

तभी   तो   माटी   के   कच्चे   चबूतरे   याद   हो  गए  है

उन  पर  गोबर  की  लिपाई  का  सौंदर्य  संस्कार  याद  रह  गए 

नीम  भी   तो   कट   गई 

कितना  कुछ  देखा  होगा  उस  नीम  की  विशाल हरीतिमा  ने

उसकी  टहनियों  की  दातून  बनती  थी

अब  तो   कोलगेट   के  ऐड  है  फ्लेवर   फाॅग  वाले

कौन   चाहेगा   कैसली   नीम   को

वो  याद  करेगा ,  करता  रहता  है

उसका   कटा   हुआ  तना 

किसी  के  प्यार  को  याद  करता

बदलते   गाँव   की  तकदीर  को  देखता - देखता

सुबकता   रहता   दिन-रात   वे  चिड़ियाँ  बंदर  भी

अब  बेघर  है   आकाश   सूना  है   तारे  गायब  है

घर  की  छत्तों  पर  बच्चों  का  कोलाहल  गायब  है

पकड़म- पकड़ाई   के  वे  स्वच्छंद  खेल  गायब  है

लोगों  का   आपस  में  मिलना - बतियाना  गायब  है

सबकुछ  में   ' मैं  ' समा  गया  है  व्यस्तता  की  बारगी  चालू  है

सबकुछ  अपनी  रुटीन  के  मुताबिक  हो  गया  है

प्रकृति  से  मिलना  गायब  है  , घर - बार  का  सौहार्द  गायब  है

लोक  पर्व   अब  किसी  को  ध्यान  नहीं  है ,  होली  दीवाली

एक  दिन  के  कुछ  बड़े  उत्सव  बन  गए   है 

एक -  दूसरे  के  घर  बधाई  देने  जाना  

हँसना - गले  लगाना  ,  हँसी - खुशी  के  पल  गायब  है

गाँव  अब  शहर  होता  जा  रहा  है  ,

विकास  की  राह  में  मेरे  गाँव  का  वजूद  मिटता  जा  रहा  है

अब  वह  शहर  होता  जा  रहा  है  अनजाना  एक  बेगाना  शहर



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