बारिश ने जोर पकड़ा हुआ है
हम अपने घर में है
बाहर सड़कें गढ्ढों से भरी है
पन्नी - प्लास्टिक से नाला जाम है
पुलों के नीचें रैन बसेरे है
कई मासूम अकेले है
पिता अपने घरौंदे को बचाये रखने की पूरी कोशिश में है
लगातार ये बारिश और तेज चलती हवाएँ
ही अब उनके साथ है , क्योंकि मैं अपने घर में हूं
गरम चाय के प्याले के साथ , अपनी शिकायतों के लिए
बस अधूरी रह जाती है मेरी संवेदना , अपने में सिमटी
वे बेजुबान बाहर ही रहेंगे
बारिश में भींगते , ठिठुरते , लड़ते
जीते - मरते , दर किनारे
भीगें कंबल के साथ
भीगें दामन लिए
मार्मिक रचना, उनके भीतर की जिजीविषा उन्हें बल देगी और सहयोग भी मिलेगा किन्हीं अनजान हाथों का
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