जब सबकुछ प्रतिकूल नजर आए
प्रंशसा - निंदा का धुँआ दर्पण को ढ़क जाए
नियति भाग्य विश्वास की परीक्षा लेने आए
तब जीत किसकी होगी ? सदैव तुम्हारी
हे मेरे पथिक !
तुम्हारे संकल्प की , अपलक मुस्कान की
न रुकने का साहस , स्वीकार्य का सामर्थ्य
तुलाओं के उत्तोलन से बाहर
स्थिर शांत मन की
धूप में मेघ में शीत में जीते पल की
कर्म के संज्ञान की , प्रवृत्ति के प्रयाण की
उद्घोषिका निरंतर प्रवाह नदिया के मातृभाव में सिमटा
एक विपुल सहभाव लिए प्रस्तरों के मैदान में
बहती जीवन की राशि !

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 11 अक्तूबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंहृदय से धन्यवाद !
हटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंधन्यवाद !
हटाएंधन्यवाद !
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