स्तन की गाँठ या मन की गाँठ
सौंदर्य लुप्त होती गाँठ
बंधे दृष्टिकोण में कसी गई गाँठ
एक उपेक्षा में धँसी पहचान खोती अधूरी गाँठ
स्तन से बाह्य रिश्ते में उभरती गाँठ
जब अपनापन अवहेलित कर देता है
लड़किया मर जाती है स्त्री
की ममता दूध के उजले
मिठास की टोह में
जब आतुर याचिका पुकारती है
ममत्व को अपने आंचल
किसी अपने को स्वीकार को प्यार को
मेरे आकार से मुझे कुरुप - कुरुप कहते तुम
बताओ मैंने किसी की चोरी या हत्या की
या तुम्हें कोई अपशब्द कहा कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं , तो अपराधी दोषी क्यों मैं
अलकों के जाल , कारा में बंदी होती चेतना
मरती नहीं स्तन गाँठ से
मरती तो तुम्हारी इस सोच के कुठाराघात से
सारा आदर्श घुल जाता तुम्हारा
पर जीना मैंने छोड़ा नहीं
तुम्हारी हाँ / ना से मैं क्यों विचलित हूँ
अपना पथ क्यों यूँ छोड़ दूँ
जो तुम्हारी नजर से दर्पण में अपना अक्स देखूँ
अपने को जानूँ - पहचानूँ कि दर्पण से बात करना छोड़ दूँ
अपने स्वीकार में अपने साक्ष्य रुप में जीवंत सदैव
जीना क्यूँ और किन बातों के कारण छोड़ दूँ ।

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 20 अक्तूबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
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