सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अपने स्वीकार में

अपने स्वीकार में


स्तन  की  गाँठ  या  मन  की गाँठ 

सौंदर्य  लुप्त  होती  गाँठ

बंधे  दृष्टिकोण  में   कसी  गई  गाँठ  

एक  उपेक्षा  में  धँसी  पहचान  खोती  अधूरी गाँठ 

स्तन से  बाह्य  रिश्ते  में  उभरती  गाँठ 

जब  अपनापन  अवहेलित  कर  देता  है  

लड़किया  मर  जाती  है  स्त्री

की  ममता  दूध  के  उजले

मिठास  की  टोह  में

जब  आतुर  याचिका  पुकारती  है

ममत्व  को  अपने  आंचल

किसी  अपने  को  स्वीकार  को प्यार  को

मेरे  आकार  से  मुझे  कुरुप - कुरुप  कहते  तुम

बताओ  मैंने  किसी  की  चोरी  या  हत्या  की  

या  तुम्हें  कोई  अपशब्द  कहा  कुछ  भी  नहीं

कुछ  भी  नहीं  ,  तो  अपराधी  दोषी  क्यों  मैं 

अलकों  के  जाल , कारा  में  बंदी  होती  चेतना

मरती  नहीं  स्तन  गाँठ  से  

मरती  तो  तुम्हारी  इस  सोच  के  कुठाराघात  से

सारा  आदर्श  घुल  जाता  तुम्हारा

पर  जीना  मैंने  छोड़ा  नहीं

तुम्हारी  हाँ / ना  से  मैं क्यों  विचलित  हूँ

अपना  पथ  क्यों  यूँ  छोड़  दूँ

जो  तुम्हारी  नजर  से   दर्पण  में  अपना  अक्स  देखूँ  

अपने  को  जानूँ - पहचानूँ  कि   दर्पण  से  बात  करना  छोड़  दूँ

अपने  स्वीकार  में  अपने  साक्ष्य  रुप  में  जीवंत  सदैव

जीना  क्यूँ   और  किन  बातों  के  कारण  छोड़  दूँ ।


टिप्पणियाँ

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 20 अक्तूबर, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

आप सभी सुधी पाठक जनों के सुझावों / प्रतिक्रियों का हार्दिक स्वागत व अभिनंदन है ।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चलो देख आए

हवाओं   से   दूर   नीलगगन   के  साथ  समंदर   का   तरंगायित   दर्पण हरियाली   का   तृण -  तृण लहराता  धरा   के   आंगन  में उत्सव   के  साथ  सावन  की  सौगात  बारिश   में   झूमता -  गाता   बालदल कागज   की    कश्ती    बनाता    और

अजन्ता - भगवतशरण उपाध्याय रचित निबन्ध

जिन्दगी  को  मौत  के  पंजों  से  मुक्त  कर  उसे  अमर  बनाने  के  लिए  आदमी  ने  पहाड़  काटा  है । किस  तरह  इंसान  की खूबियों  की  कहानी  सदियों  बाद  आने  वाली  पीढ़ी  तक  पहुँचायी  जाये , इसके  लिए  आदमी  ने  कितने  ही  उपाय  सोचे  और  किये । उसने  चट्टानों  पर  अपने  संदेश  खोदे , ताड़ों  से  ऊँचे  धातुओं  से  चिकने पत्थर  के  खम्भे  खड़े  किये , ताँबे  और  पीतल  के  पत्थरों  पर  अक्षरों  के  मोती  बिखेरे  और  उसके  जीवन - मरण  की  कहानी  सदियों  के  उतारों  पर  सरकती  चली आयी , चली  आ  रही  है , जो  आज  हमारी  अमानत - विरासत  बन  गयी  है ।       इन्हीं  उपायों...

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं - पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे !

तुम्हारे सुंदर सपने है

हर  हार  को  जीत  का  रुप  दे  देती  हो जितनी  सहजता  से  तुम  सबका ध्यान रख लेती हो उतनी  सहजता  की  मांग  है , अपने  खोए  सपनों  को पूरा करो रास्ते पर चलते समय लोग  क्या  सोचेंगे , क्या सोच रहे  है ये  कभी भी तुम्हारे  प्रश्न नहीं रहे है ,  इनसे  प्रभावित होना

बारिश

बारिश की बूँदें भीगती - भीगाती घर में एक अबोध चंचला बच्ची की तरह घुसी चली आई है उसके लिए सबकुछ जाना - पहचाना था दीवारें , लाॅन की घास गमले में लगे पौधे  बरामदे की गली से सटा मिट्टी का गोल चबूतरा और क्यारियाँ उनमें हँसते और झूमते - गाते नन्हे - नन्हे से रंग - बिरंगें फूल और  हरियाली । वहीं  किनारे दीवार से सटा पाइप लगा है जिससे छत्त का सारा पानी जिस वेग और आवाज के साथ नीचे  उतर रहा है लगता है कि पानी के निकास के लिए बनाई गई नाली के जगह पर ईट लगा दी जाये तो  बच्चों के लिए खासा स्विमिंग पूल तैयार हो जायेगा।  जैसाकि छोटे में अक्सर हम सब बच्चे बारिश मे किया करते थे दो - दो घंटें तक पानी में खेलते रहते थे नीचे नदिया ऊपर बारिश की मेहरबानी पर शायद ही हमें दो घंटें से ज्यादा पानी में रहने दिया जाता था क्योंकि इसके बाद  सबकी मम्मी बारी - बारी से सबको आवाज लगाती की अब उतर आओ नीचे , बहुत भीग चुके जल्दी से नीचे आकर दो लोटा साफ पानी डालकर  कपड़े बदल लो पर बच्चे तो बच्चे और बारिश तो बारिश जब तक  कोई ऊपर आकर हमारे बनाए गए तालाब को देखना लेता और बदले में...

सफरनामा

उठो देखो आसमान की नीलिमा  वे  घुँघराले फाहे बादल जिस तरह से आसमाँ में  अपनी गति से  चले जा रहे है  तुमको भी चलना है , विश्राम  का मतलब ठहरना  नहीं  है अपनी  ऊर्जा   को  संयत  करना  है

विश्रांत हो जाती

रोज    हवाओं    का    झोंका   , उस   सकरी    -    सी    गली   से    होकर   हौलें   से  मस्त    बहारों    को     हिलोरे    देता   हुआ   गुजरता  दीवारों     के      बीच     से पत्रों     को      रव      दे      जाता    है ।

दिवाली की रौनक तभी सफल बने

सर्द दिनों की रुहानी आहट लिए मौसम का रुख बदला है सिमटा - सिमटा दिन  गुलाबी ठंडक लिए  सूरज आसमाँ के पट पर खिलने लगे गुलाब  मंजरी पर पुलकित पुष्प

थामा के जीवन की डोर

तू  ही  बता  अब  मैं  कहा  जाऊँ थामा  के  जीवन  की  डोर  तूझे   अब  मैं   चिर  विश्राम  को  पाऊँ माता  के  आँचल  की  ओर पिता  के  दुलारे  की  ओर खिलखिलाते  बचपन  की  ओर चिर  स्वस्थ  तन  - मन  की  कोर दयालु  स्नेह  सहभावी  सुकुमार प्रेम  की   मजबूती  की  गठजोड़