अंतस के हिंडोले हृदय की हारिल
प्रदक्षिणा के फेरे सबकुछ को लुटाके
लय का रुप सिरजता है
नृत्य , गीत , संगीत
पुलक नव - नव रुप धरे
कर्म की ही परिभाषा बनते
जीवन की उत्ताल तरंगें
जब शीतल चंद्रिका से मिलती
कृष्ण बंसी टेर कानों में मधुर मधुर गूँजे
प्रेम की पुनीता ब्रज राधा - राधा बोले
शरद उत्सव निमंत्रण के फिर - फिर आते फेरे

कोमल भावों से बुनी सुंदर रचना
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